अंचल में बारिश की बेरूखी से रबी की फसल पर भी खतरा
Explainer : अल नीनो का असर : मराठवाड़ा में इस साल बारिश की बेरुखी ने आने वाले दिनों में पानी के गंभीर संकट की आशंका बढ़ा दी है। खरीफ फसलों पर संकट के बाद अब प्रशासन ने जलस्रोतों को लेकर बड़ा फैसला लिया है। जायकवाड़ी बांध को छोड़कर मराठवाड़े के अन्य छोटे-बड़े बांधों में उपलब्ध पानी को 100 प्रतिशत पीने के लिए आरक्षित रखने के निर्देश दिए गए हैं। ऐसे में रबी फसलों के लिए भी बांधों से पानी छोड़ने की योजना फिलहाल नहीं बनाई जाएगी।
संभाजीनगर समेत मराठवाड़ा में क्यों बढ़ी चिंता?
मराठवाड़े में जून से अगस्त के बीच अपेक्षा के मुताबिक बारिश नहीं हुई। बारिश की कमी का सीधा असर खेती के साथ-साथ बांधों और जलाशयों पर भी दिखाई दे रहा है। खरीफ फसलें बारिश पर निर्भर हैं और अब आने वाले समय में सबसे बड़ी चिंता पीने के पानी की उपलब्धता को लेकर है।

विभागीय आयुक्त जी. श्रीकांत के मुताबिक, जायकवाड़ी को छोड़कर मराठवाड़ा के अन्य सभी बांधों में उपलब्ध जल सिर्फ और सिर्फ पीने के पानी के लिए आरक्षित किया गया है। इसका मतलब साफ है कि इस साल रबी सीजन में सिंचाई के लिए बांधों से पानी मिलने की उम्मीद बेहद कम है।
Explainer : अल नीनो का असर : मांजरा-माकणी प्रोजेक्ट पर विशेष नजर
जिन जलाशयों में पहले से ही पानी बहुत कम बचा है, उनमें मांजरा और माकणी परियोजनाएं शामिल हैं। यहां पानी के इस्तेमाल को लेकर विशेष सावधानी बरती जा रही है।जलाशयों से अवैध तरीके से पानी निकालने वालों पर भी प्रशासन सख्त होगा। संवेदनशील जलस्रोतों पर विशेष गश्ती दल तैनात किए गए हैं। खेती या अन्य कामों के लिए अनधिकृत रूप से पानी खींचने वाले विद्युत पंप जब्त किए जाएंगे और संबंधित लोगों पर कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
महाराष्ट्र में अगस्त की बारिश ने बढ़ाई चिंता
जून और जुलाई में महाराष्ट्र के कई हिस्सों में अच्छी बारिश हुई थी। इससे खरीफ सीजन को शुरुआती राहत मिली। लेकिन अगस्त में बारिश की रफ्तार अचानक काफी धीमी हो गई।

कृषि विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, जून से अगस्त के बीच महाराष्ट्र में सामान्य बारिश 815.3 मिमी होनी चाहिए थी, जबकि वास्तविक बारिश 702.6 मिमी रही।यानी इस अवधि में राज्य में औसतन 86.2 प्रतिशत बारिश ही हुई। सबसे चिंताजनक स्थिति अगस्त की रही। इस महीने महाराष्ट्र में सामान्य के मुकाबले सिर्फ 50.9 प्रतिशत बारिश दर्ज की गई।
मराठवाड़ा में 34% बारिश की कमी
भारतीय मौसम विभाग (IMD) के 1 जून से 6 सितंबर तक के आंकड़ों के अनुसार महाराष्ट्र में सबसे खराब स्थिति मराठवाड़ा की है।इस क्षेत्र में बारिश की कमी 34 प्रतिशत तक पहुंच गई है।ऐसे में छत्रपति संभाजीनगर सहित मराठवाड़ा के जिलों में आने वाले दिनों में पानी की उपलब्धता एक बड़ी चुनौती बन सकती है।
अल नीनो से क्यों बढ़ रहा सूखे का खतरा?
अब सवाल है कि आखिर अल नीनो का मराठवाड़ा के पानी पर क्या असर है? अल नीनो प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय क्षेत्र के समुद्री पानी के असामान्य रूप से गर्म होने की स्थिति है। इसका असर दुनिया के अलग-अलग हिस्सों के मौसम पर पड़ सकता है।अल नीनो और भारतीय मानसून के बीच आम तौर पर विपरीत संबंध देखा जाता है। प्रशांत महासागर का तापमान बढ़ने पर भारत में मानसूनी बारिश कमजोर पड़ने की संभावना बढ़ सकती है।इसी वजह से अल नीनो की संभावना ने मराठवाड़ा जैसे कम बारिश वाले क्षेत्र की चिंता और बढ़ा दी है।
क्या हर अल नीनो साल में सूखा पड़ता है?
ऐसा जरूरी नहीं है।पिछले करीब 135 वर्षों के मानसून के इतिहास में अल नीनो और कमजोर बारिश के बीच मजबूत संबंध देखने को मिला है। 1880 से 2014 के दौरान करीब 90 प्रतिशत प्रभावी अल नीनो वर्षों में औसत से कम बारिश हुई, जबकि करीब 65 प्रतिशत अल नीनो प्रभावी वर्ष सूखे वाले रहे।लेकिन इसके अपवाद भी हैं।1997-98 में अल नीनो का प्रभाव काफी मजबूत था, फिर भी भारत में औसत से ज्यादा बारिश हुई थी। वहीं 2002 में अल नीनो ज्यादा सक्रिय नहीं होने के बावजूद गंभीर सूखे की स्थिति बनी थी।इसलिए सिर्फ अल नीनो को देखकर सूखे की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती। समुद्र के तापमान, मानसूनी हवाओं और अन्य मौसम प्रणालियों की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।











