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Fatfati sahab ki haveli : जब अदृश्य हाथों ने खींची जपमाला और रातभर मंडराता रहा खौफ

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डॉ. एच. एस वैदय, सीहोर.

Fatfati sahab ki haveli : जब अदृश्य हाथों ने खींची जपमाला कुछ कहानियां ऐसी होती हैं जिन्हें समय भले ही पीछे छोड़ दे, लेकिन उनकी यादें जीवनभर पीछा नहीं छोड़तीं। यह घटना भी ऐसी ही है। आज कई साल बीत चुके हैं, लेकिन जब भी उस रात को याद करता हूं, रूह तक कांप उठती है। एक साल बाद मैं फिर से सीहोर पहुंचा था। मकसद था शर्मा साहब से मुलाकात करना। जिस हवेली में पहले अजीबोगरीब घटनाएं घट चुकी थीं, उसे देखकर मैं हैरान रह गया। पूरा भवन नई दुल्हन की तरह सजाया गया था। अब उसका नाम भी बदलकर “स्पेशल ऑफिसर्स बंगला” रख दिया गया था। इमारत तो बदल गई थी, लेकिन शायद उसकी फिजा में छिपे रहस्य नहीं बदले थे।

Fatfati sahab ki haveli :जप के दौरान शुरू हुआ पहला रहस्य

शाम ढल रही थी। गर्मी का मौसम था, इसलिए अंधेरा होने में अभी वक्त था। मैं अपने कमरे में बैठकर रोज की तरह जप करने लगा।अभी मुश्किल से एक माला पूरी भी नहीं हुई थी कि अचानक मुझे महसूस हुआ कि कोई मेरी जपमाला खींच रहा है। पहले तो मैंने इसे मन का भ्रम समझा। आंखें खोलीं, इधर-उधर देखा, लेकिन कोई नहीं था। मैंने फिर जप शुरू किया। लेकिन इस बार जो हुआ, उसने मेरे होश उड़ा दिए। मेरी आंखें खुली थीं और साफ महसूस हो रहा था कि कोई मेरे हाथ से माला खींच रहा है। माला आगे बढ़ रही थी, लेकिन कमरे में मेरे अलावा कोई मौजूद नहीं था। मेरे शरीर में जैसे बिजली दौड़ गई। मैं जोर से चिल्लाया और कमरे से बाहर भाग आया।

वह रात जो कभी नहीं भूल सकता

मैं जानता था कि अगर यह बात शर्मा साहब को बताऊंगा तो वे हंसकर टाल देंगे। इसलिए मैंने चुप रहना ही बेहतर समझा।उस रात मैंने फैसला किया कि कमरे में नहीं सोऊंगा। चपरासी से कहकर अपना पलंग आंगन में लगवा लिया। रात का सन्नाटा धीरे-धीरे गहराता जा रहा था। पीपल के पेड़ की पत्तियां हवा में सरसरातीं तो अजीब-सी ध्वनि पैदा होती। दूर कहीं कुत्तों के भौंकने और रोने की आवाजें वातावरण को और भयावह बना रही थीं। काफी देर बाद नींद आ गई।लेकिन आधी रात को अचानक मेरी आंख खुली।पीठ में तेज ठंडक महसूस हुई। जब उठकर देखा तो रोंगटे खड़े हो गए। मैं जमीन पर पड़ा था। मेरा पलंग उल्टा पड़ा था और बिस्तर चारों तरफ बिखरा हुआ था। एक पल के लिए सांस थम गई। मैं समझ गया कि यह कोई सामान्य घटना नहीं थी।

चमगादड़ों की निगाहें

घबराकर मैं आंगन की दीवार फांदकर बरामदे में पहुंचा। जैसे ही लाइट जलाई, मेरी नजर ऊपर गई।सैकड़ों चमगादड़ें छत से उलटी लटकी हुई थीं। लेकिन डराने वाली बात यह नहीं थी। डराने वाली बात यह थी कि वे सभी जैसे मुझे ही घूर रही थीं। उनकी चमकती आंखें अंधेरे में किसी अनजान चेतावनी जैसी लग रही थीं। मैंने तुरंत लाइट बंद कर दी।

पानी की टंकी का रहस्य

अगले दिन मैंने गेस्ट रूम छोड़कर दूसरा कमरा ले लिया। सोचा शायद परेशानी उसी कमरे में थी। शाम शांति से बीती।लेकिन रात होते ही फिर वही सिलसिला शुरू हो गया। इस बार मुझे बार-बार ऐसा सुनाई दे रहा था जैसे कोई बाल्टी भर-भरकर पानी टंकी में फेंक रहा हो। पहले मैंने ध्यान नहीं दिया। लेकिन जब आवाज लगातार आने लगी तो मैं गुस्से में बाहर निकल आया। टंकी के पास पहुंचा। पानी बिल्कुल शांत था। चारों लोहे की बाल्टियां उलटी रखी हुई थीं। कोई इंसान वहां मौजूद नहीं था। फिर भी पानी उलीचने की आवाज लगातार आ रही थी। अब मुझे समझते देर नहीं लगी। मैं बिना पीछे देखे भाग खड़ा हुआ।

सुबह का सच

सुबह मैंने रामप्रसाद से पूछा, “कल रात पानी कौन भर रहा था?” वह हैरानी से बोला, “साहब, मेरी ड्यूटी तो रात नौ बजे खत्म हो जाती है। उसके बाद मैं घर चला जाता हूं।” उसका जवाब सुनकर मेरी आखिरी उम्मीद भी खत्म हो गई। अब मुझे यकीन हो चुका था कि हवेली में कुछ ऐसा था, जिसे समझना मेरे बस की बात नहीं थी। और फिर मैंने वह जगह छोड़ दी। मैंने बिना किसी का इंतजार किए अपना सामान बांधा और उसी दिन वहां से रवाना हो गया। आज भी जब उस हवेली, उस जपमाला, उस उलटे पलंग और उन रहस्यमयी आवाजों को याद करता हूं तो शरीर में सिहरन दौड़ जाती है। कई सवाल आज भी अनुत्तरित हैं। क्या वह सिर्फ संयोग था?क्या वह मेरा भ्रम था? या फिर सचमुच उस हवेली में कोई ऐसी शक्ति मौजूद थी, जिसे देखा नहीं जा सकता था… लेकिन महसूस जरूर किया जा सकता था।

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