महाराष्ट्र खबर 24,छत्रपति संभाजीनगर.
भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में अंतिम और अत्यंत पवित्र घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर (पूर्व में औरंगाबाद) जिले के वेरुल (एलोरा) में स्थित है। सावन माह में यहां लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। इस ज्योतिर्लिंग को घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग भी कहा जाता है, क्योंकि इसकी स्थापना भगवान शिव की परम भक्त घुश्मा की अटूट भक्ति से जुड़ी मानी जाती है।
घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग की पौराणिक कथा
शिव पुराण के अनुसार, देवगिरि पर्वत के समीप सुधर्मा नामक एक धर्मपरायण ब्राह्मण अपनी पत्नी सुदेहा के साथ रहते थे। संतान न होने के कारण सुदेहा दुखी रहती थी। पति का वंश आगे बढ़ाने के लिए उसने अपनी छोटी बहन घुश्मा का विवाह सुधर्मा से करवा दिया। घुश्मा भगवान शिव की अनन्य भक्त थीं। वह प्रतिदिन 101 पार्थिव शिवलिंग बनाकर उनकी पूजा करतीं और बाद में उन्हें सरोवर में विसर्जित कर देतीं। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें पुत्र रत्न का आशीर्वाद दिया।
समय बीतने के साथ घुश्मा का पुत्र बड़ा हुआ और उसका विवाह भी हो गया। लेकिन सुदेहा के मन में ईर्ष्या बढ़ती गई। एक दिन उसने क्रोध और द्वेष में आकर घुश्मा के पुत्र की हत्या कर दी और उसका शव उसी सरोवर में फेंक दिया, जहां घुश्मा शिवलिंगों का विसर्जन करती थीं।
अटूट भक्ति के आगे झुके भगवान शिव
अगली सुबह जब घरवालों को घटना का पता चला तो पूरे परिवार में शोक छा गया। लेकिन घुश्मा अपने आराध्य शिव की पूजा में लीन रहीं। उन्होंने बिना विचलित हुए प्रतिदिन की तरह शिवलिंगों का विसर्जन किया और भगवान शिव का स्मरण करती रहीं।
जैसे ही वह सरोवर से लौटने लगीं, उन्हें अपने पुत्र की आवाज सुनाई दी।
उनका पुत्र जीवित अवस्था में उनके सामने खड़ा था। उसी समय भगवान शिव प्रकट हुए और सुदेहा के अपराध के बारे में बताया। शिव ने सुदेहा को दंड देने की इच्छा जताई, लेकिन घुश्मा ने अपनी बहन के लिए क्षमा मांग ली।घुश्मा की करुणा, क्षमा और भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने वरदान दिया कि वे इसी स्थान पर घृष्णेश्वर (घुश्मेश्वर) नाम से सदैव विराजमान रहेंगे। तभी से यह स्थान घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रसिद्ध हुआ।
घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन का महत्व
शिव पुराण में बताया गया है कि घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन और पूजा से भक्तों को मनोवांछित फल प्राप्त होते हैं। मान्यता है कि यहां दर्शन करने से:
- संतान सुख की प्राप्ति होती है।
- पापों से मुक्ति मिलती है।
- जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है।
- भोग और मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है।
5 जून से शुरू होगा भव्य अतिरुद्र महायज्ञ
विश्व शांति, मानव कल्याण और राष्ट्र की समृद्धि की कामना के साथ घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर में 5 जून से 9 जून तक पांच दिवसीय अतिरुद्र महायज्ञ एवं अतिरुद्र अभिषेक का आयोजन किया जा रहा है।इस दौरान मंदिर परिसर में 24 घंटे वैदिक मंत्रोच्चार, रुद्रपाठ और विशेष धार्मिक अनुष्ठान होंगे। आयोजन के चलते पांच दिनों तक श्रद्धालुओं के लिए गर्भगृह में प्रवेश बंद रहेगा और भक्त केवल मुखदर्शन कर सकेंगे।

इस वर्ष के आयोजन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि भगवान घृष्णेश्वर का अभिषेक हरिद्वार से लाए गए पवित्र गंगाजल से किया जाएगा। गंगाजल लेकर पहुंचे टैंकर का मंदिर परिसर में विधिवत पूजन किया गया और श्रद्धालुओं ने जयघोष के साथ उसका स्वागत किया।आयोजन समिति के अनुसार, पांच दिनों तक लगातार इसी गंगाजल से भगवान शिव का रुद्राभिषेक किया जाएगा, जिससे पूरे क्षेत्र में भक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा का विशेष वातावरण बनेगा।
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घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग कैसे पहुंचे?
- हवाई मार्ग:
- निकटतम हवाई अड्डा छत्रपति संभाजी नगर (औरंगाबाद) है, जो मंदिर से लगभग 35 किलोमीटर की दूरी पर है।
- छत्रपति संभाजी नगर (औरंगाबाद) हवाई अड्डा, मुंबई, पुणे और दिल्ली जैसे बड़े शहरों से जुड़ा है।
- हवाई अड्डे से मंदिर तक टैक्सी या कैब द्वारा आसानी से पहुंच सकते हैं।
- रेल मार्ग:
- छत्रपति संभाजी नगर (औरंगाबाद) रेलवे स्टेशन निकटतम रेलवे स्टेशन है, जो मंदिर से 30 किमी दूर है।
- पुणे, मुंबई और नागपुर जैसे बड़े शहरों से छत्रपति संभाजी नगर (औरंगाबाद) के लिए नियमित ट्रेनें उपलब्ध हैं।
- रेलवे स्टेशन से मंदिर तक टैक्सी या बस द्वारा पहुंच सकते हैं।
- सड़क मार्ग:
- घृष्णेश्वर मंदिर सड़क मार्ग से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है।
- मुंबई से दूरी: 330 किमी (राष्ट्रीय राजमार्ग 160 से)।
- पुणे से दूरी: 230 किमी।
- छत्रपति संभाजी नगर (औरंगाबाद) से दूरी: 30 किमी।
छत्रपति संभाजी नगर (औरंगाबाद) से आपको स्थानीय बस या टैक्सी मिल जाएगी।










