Ministry of Information & Broadcasting, Govt. of India | As per IT Rules 2021 – Rule 18

रूस-चीन में लोकल लैंग्वेज में पढ़ने वाले छात्रों को झटका, अब केवल अंग्रेजी माध्यम से की गई विदेशी MBBS ही होगी मान्य

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Maharashtarkhabar24.in, नई दिल्ली, भारत में मेडिकल एजुकेशन को लेकर राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) ने बड़ा और अहम फैसला लिया है। अब विदेश में की गई MBBS डिग्री तभी भारत में मान्य होगी, जब पढ़ाई पूरी तरह अंग्रेजी माध्यम में की गई हो। यह नया नियम उन हजारों भारतीय छात्रों के लिए चिंता का विषय बन गया है, जो रूस, चीन और अन्य देशों में स्थानीय भाषा में मेडिकल की पढ़ाई कर रहे हैं।एनएमसी के ताजा निर्देश के मुताबिक, अगर किसी छात्र ने विदेशी विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के अलावा किसी अन्य भाषा में मेडिकल शिक्षा प्राप्त की है, तो उसकी डिग्री भारत में मान्यता नहीं पाएगी। आयोग का कहना है कि इस फैसले का उद्देश्य मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता और मानकों को एक समान बनाए रखना है, ताकि देश में प्रशिक्षित डॉक्टरों की दक्षता पर कोई सवाल न उठे।हर साल भारत से बड़ी संख्या में छात्र कम खर्च के कारण विदेशों का रुख करते हैं। रूस, चीन और पूर्व सोवियत देशों में लगभग 80 प्रतिशत छात्र स्थानीय भाषा में पढ़ाई करते हैं। ऐसे में इस नए नियम से इन छात्रों के करियर पर सीधा असर पड़ सकता है।

विदेशी मेडिकल संस्थानों की जांच   तेज

इसी बीच एनएमसी ने विदेशी मेडिकल संस्थानों की जांच भी तेज कर दी है। उज्बेकिस्तान के चार विश्वविद्यालयों को ब्लैकलिस्ट किया गया है, जिससे छात्रों को एडमिशन लेने से पहले पूरी जानकारी जांचने की सलाह दी गई है। भारत में जहां प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों की फीस एक करोड़ रुपये से अधिक हो सकती है, वहीं विदेशों में यही कोर्स 20 से 25 लाख रुपये में पूरा हो जाता है। कम खर्च के चलते ही छात्र विदेश जाना पसंद करते हैं, लेकिन अब भाषा संबंधी यह शर्त उनके लिए बड़ी बाधा बन सकती है।विदेश में पढ़ाई के दौरान छात्रों को पहले एक साल तक स्थानीय भाषा सीखनी पड़ती है, जिसके बाद ही वे मेडिकल कोर्स शुरू कर पाते हैं। इससे पढ़ाई की समझ और गुणवत्ता पर भी असर पड़ने की आशंका जताई जाती है। इसके अलावा नए नियम के अनुसार, जो छात्र अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाई नहीं करेंगे, उन्हें भारत में NEET परीक्षा में बैठने की अनुमति भी नहीं दी जाएगी। ऐसे में विदेश से डॉक्टर बनने का सपना देखने वाले छात्रों के लिए यह फैसला बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

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