Balram Jayanti 2026 : महाराष्ट्र का अमरावती जिला केवल ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि पौराणिक मान्यताओं के कारण भी विशेष महत्व रखता है। धार्मिक परंपरा के अनुसार वर्तमान अमरावती क्षेत्र को प्राचीन विदर्भ की राजधानी कौंडण्यपुर से जोड़ा जाता है।

शास्त्रों के अनुसार यहीं भगवान श्रीकृष्ण ने विदर्भ की राजकुमारी रुक्मिणी का हरण किया था और इसी घटनाक्रम में भगवान बलराम का मगधराज जरासंध के साथ भयंकर युद्ध हुआ था।इसी पौराणिक प्रसंग से भगवान बलराम के पराक्रम और शौर्य की कहानी भी जुड़ी है। ऐसे में 28 अगस्त 2026 को मनाई जा रही बलराम जयंती के मौके पर अमरावती से जुड़ी इस कथा को जानना बेहद रोचक है।
Balram Jayanti 2026 :अमरावती से शुरू होती है रुक्मिणी हरण की पौराणिक कथा
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार विदर्भ देश की राजधानी कौंडण्यपुर में राजा भीष्मक का शासन था। उनकी पुत्री रुक्मिणी भगवान श्रीकृष्ण को अपना पति मान चुकी थीं। वह मन ही मन श्रीकृष्ण से प्रेम करती थीं और उनके अलावा किसी अन्य से विवाह नहीं करना चाहती थीं।लेकिन रुक्मिणी के भाई रुक्मी को श्रीकृष्ण पसंद नहीं थे। वह श्रीकृष्ण का विरोधी था। रुक्मी ने अपनी बहन रुक्मिणी का विवाह चेदी नरेश शिशुपाल से तय कर दिया।

शिशुपाल को मगधराज जरासंध का समर्थन प्राप्त था। विवाह की तैयारियां शुरू हो चुकी थीं, लेकिन रुक्मिणी श्रीकृष्ण को ही अपना जीवनसाथी मान चुकी थीं।
रुक्मिणी ने श्रीकृष्ण को भेजा गुप्त संदेश
जब रुक्मिणी को लगा कि अब उनका विवाह शिशुपाल से होने वाला है, तो उन्होंने एक ब्राह्मण के माध्यम से श्रीकृष्ण को गुप्त संदेश भेजा।रुक्मिणी ने संदेश में श्रीकृष्ण से आग्रह किया कि वे उन्हें कौंडण्यपुर से ले जाएं। उन्होंने स्पष्ट कर दिया था कि यदि श्रीकृष्ण उन्हें स्वीकार नहीं करेंगे तो वह अपने प्राण त्याग देंगी।रुक्मिणी का संदेश मिलते ही श्रीकृष्ण कौंडण्यपुर के लिए रवाना हो गए।
अमरावती में मंदिर से बाहर निकलते ही श्रीकृष्ण ने किया रुक्मिणी हरण
विवाह से पहले रुक्मिणी परंपरा के अनुसार नगर के बाहर स्थित अम्बिका/गौरी माता मंदिर में पूजा करने पहुंचीं। पूजा समाप्त करने के बाद जैसे ही वह मंदिर से बाहर निकलीं, वहां श्रीकृष्ण अपने रथ के साथ मौजूद थे।

श्रीकृष्ण ने रुक्मिणी को अपने रथ पर बैठाया और वहां मौजूद राजाओं की परवाह किए बिना उन्हें लेकर द्वारका की ओर निकल पड़े।यही घटना रुक्मिणी हरण के नाम से प्रसिद्ध है।
रुक्मिणी हरण की खबर मिलते ही मच गया हड़कंप
जब शिशुपाल, जरासंध, शाल्व और दूसरे राजाओं को पता चला कि श्रीकृष्ण रुक्मिणी को लेकर जा चुके हैं, तो वे क्रोधित हो उठे।जरासंध सहित अनेक राजा अपनी विशाल सेनाओं के साथ श्रीकृष्ण का पीछा करने निकल पड़े। उद्देश्य था कि श्रीकृष्ण को रास्ते में रोककर रुक्मिणी को वापस लाया जाए।यहीं से भगवान बलराम और जरासंध के बीच हुए महायुद्ध का प्रसंग सामने आता है।
श्रीकृष्ण को सुरक्षित निकालने के लिए बलराम ने संभाला मोर्चा
श्रीकृष्ण रुक्मिणी को लेकर आगे बढ़ रहे थे। दूसरी ओर शत्रु राजाओं की विशाल सेना उनका पीछा कर रही थी।ऐसे समय में भगवान बलरामजी यदुवंश की सेना के साथ शत्रुओं के सामने खड़े हो गए।

उन्होंने श्रीकृष्ण और रुक्मिणी की सुरक्षा की जिम्मेदारी संभाली।जरासंध और उसके सहयोगी राजाओं की विशाल सेना ने यदुवंश की सेना पर हमला कर दिया। देखते ही देखते युद्ध का मैदान भयंकर रणभूमि में बदल गया।
बलराम और जरासंध के बीच हुआ भीषण युद्ध
युद्ध में दोनों पक्षों की सेनाएं आमने-सामने थीं। जरासंध की सेना ने बलरामजी और यादव सेना पर चारों ओर से हमला किया।लेकिन भगवान बलराम अपने अद्भुत पराक्रम के लिए प्रसिद्ध थे। उनका प्रमुख अस्त्र हल और मूसल था। इसी कारण उन्हें हलधर और हलायुध भी कहा जाता है।बलरामजी ने अपने शौर्य से जरासंध और उसके सहयोगी राजाओं की सेना का सामना किया। युद्ध में यादव सेना ने शत्रु सेना को भारी नुकसान पहुंचाया और जरासंध के अभियान को विफल कर दिया।यह प्रसंग भगवान बलराम की शक्ति, युद्ध कौशल और अपने भाई श्रीकृष्ण के प्रति उनके संरक्षण भाव को दर्शाता है।
बलराम जयंती से क्यों जुड़ती है अमरावती की यह कथा?
बलराम जयंती 2026 के अवसर पर भगवान बलराम के जीवन और उनके पराक्रम को याद किया जाता है। भाद्रपद कृष्ण पक्ष की षष्ठी को मनाया जाने वाला यह पर्व हलषष्ठी और हरछठ के नाम से भी जाना जाता है।भगवान बलराम को भगवान शेषनाग का अवतार माना जाता है। वे श्रीकृष्ण के बड़े भाई थे और उनके प्रमुख अस्त्र हल और मूसल माने जाते हैं।रुक्मिणी हरण के प्रसंग में भी बलरामजी की महत्वपूर्ण भूमिका सामने आती है। जब श्रीकृष्ण रुक्मिणी को लेकर जा रहे थे और जरासंध सहित कई शक्तिशाली राजा उनका पीछा कर रहे थे, तब बलरामजी ने यादव सेना के साथ मोर्चा संभाला था।
अमरावती के लिए क्यों खास है यह पौराणिक प्रसंग?
अमरावती और विदर्भ क्षेत्र से जुड़ी रुक्मिणी-कृष्ण की पौराणिक परंपरा आज भी लोगों के लिए आस्था का विषय है। अमरावती के कौंडिन्यपुर/कुण्डिनपुर क्षेत्र को इस प्राचीन कथा से जोड़ा जाता है।इसी वजह से अमरावती केवल महाराष्ट्र का एक महत्वपूर्ण शहर ही नहीं, बल्कि कृष्ण-रुक्मिणी परंपरा से जुड़े धार्मिक और पौराणिक स्थलों के कारण भी विशेष पहचान रखता है।28 अगस्त को बलराम जयंती के अवसर पर जब देशभर में भगवान बलराम की पूजा होगी, तब अमरावती से जुड़ी यह पौराणिक कथा उनके शौर्य और पराक्रम की याद भी दिलाएगी।










