आषाढ़ी एकादशी 2026 : महाराष्ट्र में मनाया जाने वाला आषाढ़ी एकादशी केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था, भक्ति और संत परंपरा का जीवंत प्रतीक है। इस वर्ष 25 जुलाई 2026 (शनिवार) को आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी पूरे महाराष्ट्र सहित देशभर में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई जाएगी। इस अवसर पर भगवान श्री विठ्ठल और माता रुक्मिणी के दर्शन के लिए लाखों श्रद्धालु सोलापुर जिले स्थित पवित्र तीर्थ पंढरपुर पहुंचते हैं।आषाढ़ी एकादशी के अवसर पर पंढरपुर में हर वर्ष विशाल धार्मिक मेला लगता है। महाराष्ट्र के कोने-कोने से आने वाले वारकरी कई दिनों तक पैदल यात्रा कर भगवान विठ्ठल के चरणों में अपनी श्रद्धा अर्पित करते हैं। “ज्ञानबा-तुकाराम” और “विठ्ठल-विठ्ठल जय हरि विठ्ठल” के जयघोष से पूरा पंढरपुर भक्तिमय वातावरण में डूब जाता है।
क्या है आषाढ़ी एकादशी का महत्व?
हिंदू धर्म में वर्षभर आने वाली 24 एकादशियों में आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी का विशेष महत्व माना जाता है। इसे देवशयनी एकादशी और हरिशयनी एकादशी भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन भगवान विष्णु चार महीने के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं। इसी दिन से चातुर्मास का शुभारंभ होता है, जो कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवउठनी एकादशी) तक चलता है।महाराष्ट्र में भगवान विठ्ठल को भगवान विष्णु का ही स्वरूप माना जाता है। इसलिए इस दिन पंढरपुर में विशेष पूजा-अर्चना और दर्शन का अत्यंत महत्व है।

आषाढ़ी एकादशी 2026 : पंढरपुर वारी, सदियों पुरानी परंपरा
आषाढ़ी एकादशी की सबसे बड़ी पहचान पंढरपुर वारी है। यह परंपरा लगभग 700–800 वर्षों से चली आ रही है। संत ज्ञानेश्वर महाराज (आलंदी) और संत तुकाराम महाराज (देहू) की पालखियां हजारों वारकरियों के साथ कई दिनों की पैदल यात्रा करते हुए पंढरपुर पहुंचती हैं। यात्रा के दौरान श्रद्धालु भजन-कीर्तन, अभंग, हरिनाम संकीर्तन और सामूहिक प्रार्थना करते हुए आगे बढ़ते हैं। रास्ते भर स्थानीय लोग वारकरियों का स्वागत करते हैं तथा भोजन, पानी और चिकित्सा जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराते हैं। यह यात्रा सामाजिक एकता, सेवा और भक्ति का अद्भुत उदाहरण मानी जाती है।
लाखों श्रद्धालुओं पहुंचते हैं पंढरपुर
आषाढ़ी एकादशी पर पंढरपुर में लाखों श्रद्धालु एकत्रित होते हैं। दर्शन से पहले श्रद्धालु चंद्रभागा नदी में स्नान करते हैं और उसके बाद श्री विठ्ठल-रुक्मिणी मंदिर में भगवान के दर्शन करते हैं। मंदिर परिसर में पूरी रात भजन, कीर्तन और धार्मिक कार्यक्रम चलते रहते हैं। राज्य सरकार और जिला प्रशासन की ओर से श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए व्यापक व्यवस्थाएं की जाती हैं। अतिरिक्त पुलिस बल, यातायात नियंत्रण, चिकित्सा शिविर, पेयजल, सफाई, मोबाइल शौचालय और आपातकालीन सेवाएं उपलब्ध कराई जाती हैं।
वारकरी संप्रदाय की विशेषता
महाराष्ट्र की वारकरी परंपरा संत ज्ञानेश्वर, संत तुकाराम, संत नामदेव, संत एकनाथ और संत चोखामेला जैसे महान संतों की शिक्षाओं पर आधारित है। इस परंपरा में जाति, वर्ग और आर्थिक स्थिति से ऊपर उठकर सभी लोग समान भाव से भगवान विठ्ठल की भक्ति करते हैं। वारकरी सादगी, सेवा, भजन, कीर्तन, नामस्मरण और अनुशासित जीवन को महत्व देते हैं। यही कारण है कि यह परंपरा आज भी लाखों लोगों को आध्यात्मिक रूप से जोड़ती है।
आषाढ़ी एकादशी पर व्रत और पूजा विधि
इस दिन श्रद्धालु प्रातः स्नान कर भगवान विष्णु और भगवान विठ्ठल की पूजा करते हैं। तुलसी दल, पीले पुष्प, धूप, दीप, फल और पंचामृत अर्पित किया जाता है। अनेक लोग निर्जला व्रत रखते हैं, जबकि कुछ श्रद्धालु फलाहार करते हैं। दिनभर “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप, विष्णु सहस्रनाम का पाठ, भगवद्गीता का अध्ययन और भजन-कीर्तन करने की परंपरा है। शाम को आरती के बाद प्रसाद वितरित किया जाता है।
आषाढ़ी एकादशी से शुरू होता है चातुर्मास
धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में प्रवेश करते हैं। इसके साथ ही चातुर्मास आरंभ होता है। इन चार महीनों में विवाह जैसे मांगलिक कार्य सामान्यतः नहीं किए जाते। साधु-संत एक स्थान पर रहकर प्रवचन, सत्संग और धार्मिक अनुष्ठान करते हैं।
पंढरपुर मंदिर का धार्मिक महत्व
पंढरपुर का श्री विठ्ठल-रुक्मिणी मंदिर महाराष्ट्र के सबसे महत्वपूर्ण तीर्थस्थलों में गिना जाता है। मान्यता है कि भगवान विठ्ठल अपने भक्त पुंडलिक की भक्ति से प्रसन्न होकर यहां ईंट पर खड़े हुए थे।
पंढरपूर वारी यानी आस्था, भक्ति और अटूट विश्वास की पवित्र यात्रा! 🚩
भगवान विट्ठल के दर्शन के लिए पैदल चलने वाले हर वारकरी भाई-बहन की सेवा, सुरक्षा और सुविधा के लिए उपमुख्यमंत्री @mieknathshinde जी के नेतृत्व में महायुति सरकार पूरी तरह समर्पित है।
श्रद्धा की इस महान परंपरा को… pic.twitter.com/j9gEVwii87
— 𝐒𝐀𝐔𝐑𝐀𝐁𝐇 (@VoiceOfSaurabh5) July 24, 2026
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इसी कारण भगवान विठ्ठल की प्रतिमा दोनों हाथ कमर पर रखे हुए ईंट पर खड़ी दिखाई देती है। हर वर्ष आषाढ़ी और कार्तिकी एकादशी पर यहां सबसे अधिक श्रद्धालु पहुंचते हैं।
श्रद्धालुओं के लिए प्रशासन की अपील
प्रशासन ने श्रद्धालुओं से अपील की है कि वे निर्धारित मार्गों का पालन करें, भीड़भाड़ वाले क्षेत्रों में सावधानी बरतें, बच्चों और बुजुर्गों का विशेष ध्यान रखें तथा किसी भी आपात स्थिति में पुलिस और हेल्प डेस्क से संपर्क करें। स्वास्थ्य विभाग ने पर्याप्त एंबुलेंस और चिकित्सा दल भी तैनात किए हैं।

आषाढ़ी एकादशी महाराष्ट्र की धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक विरासत का सबसे महत्वपूर्ण पर्व है। पंढरपुर की वारी केवल एक यात्रा नहीं, बल्कि समानता, सेवा, भक्ति और संत परंपरा का जीवंत संदेश है। लाखों वारकरियों की अटूट श्रद्धा इस पर्व को भारत के सबसे बड़े आध्यात्मिक आयोजनों में शामिल करती है। भगवान विठ्ठल के जयघोष, अभंगों की मधुर धुन और भक्ति से सराबोर वातावरण हर श्रद्धालु के मन में आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार करता है।










