Sambhajinagar Navratra Mela : नवरात्रोत्सव के दौरान कर्णपुरा देवी मंदिर परिसर में भव्य मेले का आयोजन होता है। इस मेले में छोटे-बड़े झूले, मनोरंजन के साधन, खानपान की दुकानें और खरीदारी के लिए विभिन्न स्टॉल लगाए जाते हैं। रात के समय आकर्षक विद्युत रोशनी से पूरा परिसर जगमगा उठता है। कर्णपुरा मेले का आनंद लेने के लिए छत्रपति संभाजीनगर शहर के साथ ही आसपास के क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। देवी के दर्शन के साथ मेले में घूमना और खरीदारी करना यहां कई परिवारों की नवरात्र परंपरा का अहम हिस्सा बन चुका है।
Sambhajinagar Navratra Mela : कर्णिका माता के रूप में पूजी जाती हैं देवी
कर्णपुरा देवी को कर्णिका माता के नाम से भी जाना जाता है। माता को तुलजाभवानी का स्वरूप मानने के कारण श्रद्धालुओं में इस मंदिर के प्रति विशेष आस्था है। नवरात्र के नौ दिनों में मंदिर में विभिन्न धार्मिक और सामाजिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। भजन, कीर्तन और गोंधल जैसे धार्मिक आयोजनों के साथ स्वास्थ्य जांच शिविर और रक्तदान शिविर भी लगाए जाते हैं।स्वास्थ्य जांच शिविरों के माध्यम से श्रद्धालुओं को निःशुल्क स्वास्थ्य जांच की सुविधा मिलती है, जबकि रक्तदान शिविरों के जरिए सामाजिक कार्यों को बढ़ावा दिया जाता है। नवरात्र के दौरान श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए प्रशासन की ओर से पुलिस बंदोबस्त किया जाता है। साथ ही आपातकालीन स्थिति से निपटने के लिए एंबुलेंस की व्यवस्था भी उपलब्ध रखी जाती है।
राजा कर्णसिंह के नाम से पड़ा कर्णपुरा नाम
स्थानीय मान्यताओं और उपलब्ध उल्लेखों के अनुसार, लगभग 1835 ईस्वी में राजस्थान के राजा कर्णसिंह छत्रपति संभाजीनगर क्षेत्र में रहने आए थे। वे कर्णिका माता के भक्त थे और उन्होंने यहां देवी का मंदिर बनवाया था। बताया जाता है कि राजा कर्णसिंह करीब 20 से 25 वर्षों तक इस क्षेत्र में रहे। उनके नाम और यहां के प्रवास के कारण इस इलाके को कर्णपुरा नाम मिलने की जानकारी दी जाती है। बाद में मंदिर की जिम्मेदारी दानवे परिवार को सौंपी गई। समय के साथ मंदिर का जीर्णोद्धार भी कराया गया।
काले पाषाण की मूर्ति और आकर्षक नक्काशी है खास
तुलजाभवानी का स्वरूप मानी जाने वाली कर्णिका माता के मंदिर में प्रवेश करते ही भव्य सभामंडप दिखाई देता है। सभामंडप के बाईं ओर देवी का गर्भगृह है, जहां काले पाषाण से निर्मित माता की मूर्ति विराजमान है। मुकुट, वस्त्र और विभिन्न आभूषणों से सुसज्जित देवी का स्वरूप श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है।

देवी की मूर्ति के पीछे बनी प्रभावली पर सुंदर नक्काशी की गई है। मखर के मध्य में कीर्तिमुख और ऊपरी हिस्से में एक ओर चंद्रमा तथा दूसरी ओर सूर्य की आकृतियां उकेरी गई हैं। गर्भगृह के प्रवेशद्वार के पास स्थित स्तंभों के ऊपरी हिस्से में सरस्वती और धनलक्ष्मी की मूर्तियां भी देखने को मिलती हैं। मंदिर की यह कलाकारी इसकी धार्मिक आस्था के साथ-साथ स्थापत्य और कलात्मक विशेषताओं को भी दर्शाती है।
देवी के शयनगृह से जुड़ी है विशेष मान्यता
मंदिर में एक पालने में शयनगादी रखी गई है। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि रात के समय देवी इसी स्थान पर विश्राम करती हैं। इस कारण मंदिर की धार्मिक परंपराओं में इस स्थान का विशेष महत्व है।
अष्टमी को होम-हवन, दशमी पर होता है सीमोल्लंघन
मंदिर समिति के सदस्य आकाश दानवे के अनुसार, मंदिर करीब 400 वर्ष पुराना है और वर्ष 1983 में इसका जीर्णोद्धार किया गया था। हर साल नवरात्र के दौरान यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। उत्सव के नौ दिनों में विभिन्न धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।आकाश दानवे बताते हैं कि नवरात्र की अष्टमी को होम-हवन किया जाता है, जबकि दशमी के दिन मंदिर का रथ निकाला जाता है और सीमोल्लंघन की परंपरा निभाई जाती है। मंदिर परिसर में लगने वाले बड़े मेले को देखते हुए प्रशासन की ओर से भी आवश्यक व्यवस्थाएं की जाती हैं।
आस्था, परंपरा और सामाजिक सेवा का संगम
कर्णपुरा देवी मंदिर नवरात्र के दौरान धार्मिक गतिविधियों, सामाजिक सेवा और सांस्कृतिक उत्सव का प्रमुख केंद्र बन जाता है। एक ओर माता के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की कतारें लगती हैं, तो दूसरी ओर मेले में झूले, दुकानें और रोशनी लोगों को आकर्षित करती हैं। धार्मिक परंपराओं और सामाजिक उपक्रमों के इस संगम के कारण कर्णपुरा देवी मंदिर छत्रपति संभाजीनगर के प्रमुख आस्था स्थलों में विशेष स्थान रखता है।










