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‘अभी न जाओ छोड़कर’… और खामोश हो गई आशा ताई की आवाज, संगीत जगत शोक में, सोमवार शाम शिवाजी पार्क में होगा अंतिम संस्कार

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Maharashtrakhabar24.in, मुंबई. भारतीय संगीत जगत के लिए रविवार का दिन बेहद दुखद रहा। सुरों की मल्लिका और अपनी अनोखी आवाज से करोड़ों दिलों पर राज करने वाली महान गायिका आशा भोसले का 92 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। उन्होंने मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में अंतिम सांस ली। उनके निधन से संगीत की दुनिया जैसे सूनी हो गई है और हर आंख नम है। सोमवार शाम 4 बजे मुंबई के शिवाजी पार्क में उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा, जहां देशभर से उनके चाहने वाले और दिग्गज कलाकार उन्हें अंतिम विदाई देंगे।

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12 हजार से अधिक गीत गाए

दादा साहेब फाल्के और पद्म विभूषण जैसे सर्वोच्च सम्मानों से सम्मानित आशा ताई की आवाज में एक अलग ही जादू था—रवानी, चंचलता और अद्भुत अभिव्यक्ति। उन्होंने 14 भाषाओं में करीब 12 हजार से अधिक गीत गाकर संगीत को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया। किशोर कुमार के साथ उनकी जोड़ी को आज भी संगीत प्रेमी बेहद पसंद करते हैं।

संघर्षों से भरी रही जिंदगी

8 सितंबर 1933 को महाराष्ट्र के सांगली में जन्मीं आशा भोसले ने बेहद कम उम्र में ही संघर्षों का सामना किया। 9 साल की उम्र में पिता दीनानाथ मंगेशकर के निधन के बाद परिवार मुंबई आ गया। उन्होंने 1943 में मराठी फिल्म ‘चला चला नवबाला’ से गायन की शुरुआत की और 1948 में हिंदी फिल्म ‘चुनरिया’ में ‘सावन आया रे’ गाकर पहचान बनाई। उनका निजी जीवन भी आसान नहीं रहा। कम उम्र में शादी, पारिवारिक संघर्ष, बेटी की आत्महत्या और बेटे की असमय मृत्यु जैसे कई गहरे दुख उन्होंने झेले। बावजूद इसके, उन्होंने कभी हार नहीं मानी और अपनी मेहनत व प्रतिभा से संगीत जगत में अलग मुकाम बनाया।

सीहोर के शरबती गेहूं की रोटियां थीं पसंद

आशा ताई का मध्य प्रदेश, खासकर सीहोर और इंदौर से गहरा भावनात्मक रिश्ता रहा। उनका बचपन इंदौर के छावनी क्षेत्र के मुराई मोहल्ले में बीता। वे अक्सर इंदौर की यादों को साझा करती थीं। इंदौर निवासी रिश्तेदारों के मुताबिक, सीहोर के शरबती गेहूं की रोटियां भी उन्हें खास तौर पर भाती थीं, जिन्हें वे मंगवाया करती थीं। उन्हें सराफा की खाऊ गली के गुलाब जामुन, रबड़ी और दही बड़े बेहद पसंद थे। बताया जाता है कि बचपन में वे अपनी बहनों लता मंगेशकर और मीना के साथ छावनी से तोपखाना तक करीब 2.5 किलोमीटर पैदल चलकर भोजन करने जाती थीं। इंदौर से उनका लगाव इतना गहरा था कि वे यहां अक्सर आया करती थीं।आशा भोसले का जाना केवल एक महान गायिका का अंत नहीं, बल्कि एक युग का समापन है। उनकी आवाज, उनके गीत और उनकी यादें हमेशा संगीत प्रेमियों के दिलों में जिंदा रहेंगी।

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